सोशल मीडिया पर खबर चलाने वालों को झटका – उत्तराखंड हाईकोर्ट ने दिखाया कानून का आईना

नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर की जा रही कथित पत्रकारिता को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि पत्रकारिता के नाम पर प्रसारित की जाने वाली सामग्री को तय ‘कोड ऑफ एथिक्स’ का पालन करना अनिवार्य है। अन्यथा संबंधित व्यक्ति कानूनी कार्रवाई के दायरे में आएगा।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की एकलपीठ ने हिमांशु ठाकुर बनाम राज्य सरकार व अन्य (रिट याचिका (क्रिमिनल) संख्या 249/2026) की सुनवाई के दौरान की।
क्या है मामला?
सुनवाई के दौरान अदालत को अवगत कराया गया कि याचिकाकर्ता द्वारा सोशल मीडिया पर जारी एक ‘मीडिया बाइट’ के कारण शिकायतकर्ता (प्रतिवादी संख्या-3) की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा। शिकायतकर्ता की ओर से कहा गया कि उक्त मीडिया बाइट वायरल होने के बाद उन्हें लगातार व्हाट्सएप संदेश मिल रहे हैं तथा विभागीय कार्रवाई भी प्रारंभ कर दी गई, जबकि मूल शिकायत बाद में वापस ले ली गई थी।
याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट को बताया गया कि संबंधित मीडिया बाइट को अब सोशल मीडिया से हटा लिया गया है।
किन नियमों का दिया हवाला?
सुनवाई के दौरान वर्ष 2021 की अधिसूचना का भी उल्लेख किया गया, जिसके तहत सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 87(2) के अंतर्गत बनाए गए आईटी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस एवं डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) नियम, 2021 प्रभावी हैं।
कोर्ट ने विशेष रूप से नियम-9 (Rule 9) का उल्लेख करते हुए कहा कि कोई भी डिजिटल मीडिया प्रकाशक भारत में निर्धारित कोड ऑफ एथिक्स का पालन करने के लिए बाध्य है।
अदालत का स्पष्ट संदेश
हाईकोर्ट की टिप्पणी को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सक्रिय पत्रकारों और कंटेंट क्रिएटर्स के लिए एक स्पष्ट चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है। अदालत ने संकेत दिया कि सोशल मीडिया पर प्रसारित की जाने वाली सामग्री भी विधिक दायरे में आती है और प्रतिष्ठा हानि, भ्रामक सूचना या अप्रमाणित आरोपों के मामलों में संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।
कानूनी जानकारों का मानना है कि यह आदेश डिजिटल पत्रकारिता में जवाबदेही और जिम्मेदारी तय करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जाएगा।



