ख़बरीलाल ख़ोज ( मनीश बावा) रुद्रपुर : उत्तराखंड की सामाजिक-सांस्कृतिक विविधता में अपनी सशक्त पहचान रखने वाला पंजाबी समाज आज गहरे आत्ममंथन के दौर से गुजर रहा है। कभी लोहड़ी और बैसाखी जैसे पर्वों के माध्यम से पूरे प्रदेश में अपनी सांस्कृतिक उपस्थिति दर्ज कराने वाला पंजाबी समाज अब इस सवाल से जूझ रहा है कि क्या उत्तराखंड में उसकी पहचान महज नाम भर तक सिमट कर रह जाएगी।
रुद्रपुर पंजाबी सभा के संस्थापक अध्यक्ष बलवंत अरोड़ा ‘बल्लू’ ने समाज के नाम एक भावुक अपील जारी करते हुए इस चिंता को सार्वजनिक रूप से सामने रखा है। उन्होंने कहा कि रुद्रपुर, हल्द्वानी, लालकुआं, काशीपुर और देहरादून जैसे शहरों में वर्षों तक बड़े पैमाने पर आयोजित होने वाले लोहड़ी और बैसाखी मेले पिछले पांच-छह वर्षों से लगभग समाप्ति की कगार पर पहुंच चुके हैं। ये आयोजन कभी समाज की एकता, सांस्कृतिक चेतना और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का सशक्त माध्यम हुआ करते थे, लेकिन आज वे आपसी मतभेदों और राजनीतिक खींचतान की भेंट चढ़ते नजर आ रहे हैं।
बलवंत अरोड़ा ने सवाल उठाया कि क्या इसके लिए समाज के तथाकथित नेता और अग्रणी लोग जिम्मेदार नहीं हैं। उन्होंने कहा कि पंजाबी समाज के भीतर ऐसी गंदी राजनीतिक आग लग चुकी है, जो बुझने के बजाय लगातार भड़कती जा रही है। इसका सबसे बड़ा नुकसान आने वाली पीढ़ी को हो रहा है, जो धीरे-धीरे अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं से दूर होती जा रही है।
उन्होंने कहा कि आज उत्तराखंड का हर समाज संगठित होकर अपनी पहचान, संस्कृति और अधिकारों के लिए सक्रिय रूप से काम कर रहा है, जबकि पंजाबी समाज के कुछ नेता समाज को जोड़ने के बजाय उसे कमजोर करने में लगे हुए हैं। यह स्थिति न केवल चिंताजनक है, बल्कि भविष्य के लिए गंभीर चेतावनी भी है।
अपनी अपील में उन्होंने समाज के लोगों से आग्रह किया कि वे अपने परिवार, बच्चों और मित्रों के साथ बैठकर गंभीरता से विचार करें कि यदि वे अपनी मां समान संस्कृति और भाषा को नहीं बचा पाए, तो आने वाली पीढ़ियों को क्या विरासत सौंप पाएंगे। उन्होंने कहा कि पंजाबी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि हमारी मां है। हिंदुस्तान हमारी मां है, भारत हमारी माता है, लेकिन पंजाबी भी हमारी मां है। जो अपनी मां का नहीं हो सका, वह किसी का नहीं हो सकता।
अंत में उन्होंने उत्तराखंड के सभी पंजाबी भाई-बहनों और बच्चों से राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर एकजुट होने की अपील की, ताकि पंजाबी समाज की सांस्कृतिक पहचान को फिर से सशक्त किया जा सके और लोहड़ी व बैसाखी जैसे पर्व एक बार फिर उसी उत्साह, गरिमा और सामूहिक भावना के साथ मनाए जा सकें, जैसे कभी मनाए जाते थे।


