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ओवरलोड डंपर बन गए कानून के ठेकेदार—विरोध करने पर FIR, मौत पर ‘नो कमेंट’! राजनीतिक बयानबाज़ी जारी

ओवरलोड डंपर बन गए कानून के ठेकेदार—विरोध करने पर FIR, मौत पर ‘नो कमेंट’! राजनीतिक बयानबाज़ी जारी

क्षेत्रीय ब्यूरो ! मनीश बावा ( ख़बरीलाल ख़ोज ) रुद्रपुर : सड़कों पर दिन-रात दौड़ रहे ओवरलोड डंपर अब नियम-कायदों से ऊपर खड़े दिखाई दे रहे हैं। खनन और परिवहन से जुड़े इस अवैध नेटवर्क की रफ्तार इतनी तेज है कि न कानून रोक पा रहा है और न ही प्रशासन कोई प्रभावी कदम उठा पा रहा है। हालत यह है कि इन ओवरलोड डंपरों पर सवाल उठाने वालों के खिलाफ तो मुकदमे दर्ज कर दिए जाते हैं, लेकिन हादसों में हुई मौतों पर प्रशासन के पास ‘नो कमेंट’ के अलावा कुछ नहीं बचता।

सड़कें टूटीं, हादसे बढ़े—लेकिन ओवरलोड का खेल जारी

क्षेत्र में ओवरलोडिंग का कारोबार इतने बड़े पैमाने पर चल रहा है कि सड़कों की हालत दिन-ब-दिन बदतर होती जा रही है। ग्रामीण मार्गों से लेकर मुख्य सड़कों तक हर जगह ओवरलोड डंपरों की दहाड़ सुनाई देती है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि रात के समय इन डंपरों की रफ्तार और दबंगई कई गुना बढ़ जाती है।
बिना रिफ्लेक्टर
बिना नंबर प्लेट
फिटनेस की धज्जियां उड़ाते वाहन
ऐसे वाहन आम नागरिकों के लिए चलती फिरती मौत बन गए हैं।

हादसों के बाद भी जिम्मेदारी तय नहीं

पिछले महीनों में कई गंभीर हादसे इसी ओवरलोडिंग के कारण हुए, लेकिन किसी भी मामले में न तो बड़ी कार्रवाई हुई और न ही जिम्मेदार विभागों से कोई ठोस जवाब मिला।
परिजनों का सवाल है—
“हमारे लोगों की मौत का दोषी कौन? डंपर वाला, सिस्टम या वह तंत्र जो इन्हें खुली छूट देता है?”
लेकिन इस सवाल का अब तक कोई जवाब नहीं मिला।

विरोध की आवाज उठाई—तो मुकदमा!

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि क्षेत्र में ओवरलोडिंग के खिलाफ आवाज उठाने वालों पर ही कार्रवाई हो रही है। कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय नागरिकों पर प्राथमिकी दर्ज की गई है, जिसके बाद जनता में रोष बढ़ गया है।
जनता पूछ रही है—
“क्या ओवरलोडिंग का विरोध करना ही अपराध है?”

लोगों का आरोप है कि यह पूरी प्रक्रिया केवल माफियाओं को बचाने और विरोध को कुचलने का प्रयास है।

राजनीति में बयानबाज़ी, जमीन पर जीरो कार्रवाई

ओवरलोडिंग का मुद्दा राजनीति में तो खूब गरमाता है।
एक तरफ विपक्ष सरकार पर ठोस कदम न उठाने का आरोप लगाता है, वहीं सत्ता पक्ष इसे पूर्व सरकारों की देन बताता है।
नेता सड़क पर उतरकर बयान दे देते हैं, मीटिंग कर लेते हैं, ट्वीट कर देते हैं—लेकिन इस पूरे तमाशे के बाद भी हालात जस के तस बने हुए हैं।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि—

“जब तक ओवरलोडिंग के इस खेल में शामिल बड़े चेहरे उजागर नहीं होते, तब तक सिर्फ बयानबाज़ी ही जारी रहेगी।”

ओवरलोडिंग का काला नेटवर्क—हर दिन लाखों का खेल

सूत्रों के अनुसार ओवरलोडिंग कोई साधारण नियम उल्लंघन नहीं, बल्कि एक सुनियोजित और भारी आर्थिक लाभ वाला नेटवर्क है।
इसमें—
खनन माफिया
वाहन मालिक
दलाल
कुछ विभागीय कर्मचारी
और राजनीतिक संरक्षण
शामिल बताए जाते हैं।
हर दिन लाखों रुपये का अवैध लाभ इस कारोबार से जुड़ा होने के कारण इस पर रोक लगाना मुश्किल बन जाता है

निष्कर्ष: आखिर मौतों का जिम्मेदार कौन?

ओवरलोड डंपरों का यह बेकाबू खेल सिर्फ सड़क सुरक्षा का मुद्दा नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था, राजनीतिक हस्तक्षेप और कानून व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है।
जब विरोध करने वालों पर मुकदमा और हादसों पर खामोशी हो—तो जनता का भरोसा टूटना स्वाभाविक है।
सभी की नजर अब इस बात पर है कि क्या प्रशासन और राजनीति इस मामले में जागेगी, या फिर ओवरलोड डंपरों का यह ‘ठेकेदार राज’ यूं ही चलता रहेगा
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